लेखिका : नेहा वर्मा
उसके आते ही मुझे कमला ने पास ही सब्जी मण्डी से सब्जी लाने भेज दिया। मैं जल्दी से बाहर निकली और थोड़ी दूर जाने के बाद मुझे अचानक याद आया कि कपड़े भी प्रेस कराने थे…मैं वापस लौट आई। कमला और साहिल दोनों ही मुझे नजर नहीं आये… साहिल भी कमरे में नहीं था। मै सीधे कमला के कमरे की तरफ़ चली आई… मुझे वहां पर हंसने की आवाज आई… फिर एक सिसकारी की आवाज आई… मैं ठिठक गई।
अचानक हाय … की आवाज कानों से टकराई… मैं तुरंत ही बाहर आ गई मुझे लगा कि मां अन्दर साहिल के कुछ ऐसा वैसा तो नहीं कर रही है।
मैंने बाहर बरामदे में आकर आवाज लगाई…”मां जी…! कपड़े कहां रखे हैं?”
कमला तुरन्त अपने कमरे में से निकल आई… साहिल कमरे में ही था। अपने अस्त व्यस्त कपड़े सम्हालती हुई बाहर आ कर कहने लगी,”ये बाहर ही तो रखे हैं…”
उनके स्तनों पर से ब्लाऊज की सलवटें बता रही थी कि अभी बोबे दबवा कर आ रही हैं…उनकी आंखें सारा भेद खोल रही थी। आंखो में वासना के गुलाबी डोरे अभी भी खिंचे हुए थे। मुझे सनसनी सी होने लगी… तो क्या कमला … यानी मेरी सास और साहिल मजे करते हैं… ?